Wednesday, May 26, 2010

नरगिस--यथार्थ अभिनय का पर्याय
















फ्लैश बैक------

स्मरण दिवस पर विशेष-3 मई.
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नरगिस का नाम सुनते ही पुराने लोगों के सपनों में घुस जाना है. 60-70 के दशक में नरगिस होने का मतलब आप दिलों की धड़कन, सपनों की शहजादी और भारतीय नारी का प्रतिनिधित्व करने वाली ऐसी अदाकारा के बारे में बात कर रहे हैं जो पूरे भारत वर्ष में सम्मान का प्रतीक थीं. पुराने लोगों से मतलब सफेद बालों में सिमटा अनुभव है जिसे नरगिस का जमाना देखने का शहूर मालूम है. आज भी इन अनुभवी लोगों से नरगिस के बारे में बात की जाए तो अजीब सी दिलकश मुस्कुराहट होठों पर तैर आती है. नरगिस भारत वर्ष की पहली ऐसी नायिका थीं जिसनें न सिर्फ नारी सम्मान को प्रतिस्थापित किया बल्कि फिल्मों में नारी की मौदूजगी को भी ऊँचाइयों पर ले गई थीं.
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नरगिस को खूबसूरत कहने में जुबान लडख़ड़ाती है और कलम भी आनाकानी करती है. मुर्गी के अंडे जैसा चेहरा और लट्ठे जैसी सीधी सपाट काया. अपनी इस अनाकर्षता के बावजूद उसे मंजिल मिल गई. उसके पास रुप भले न हो, पर अपील थीं. उसके व्यक्तित्व में मिठास भले न हो, पर चार्म था. और खासकर उसकी अदाओं में गुलमोहर-सी दिलकश डिगनिटी थीं, इसलिए अंदाज की अंगरेजीदां नीना हो या बाबुल की गंवार उजंड्ड लड़की...नरगिस कभी चोप नहीं लगी. अभिनय क्षमता की और अपनी डिगनिटी की बदौलत वह अपनी हर न्यूनता को मात दे गई. उन दिनों मधुबाला खूबसूरती में चार चाँद लगा रही थीं. गीताबाली अभिनय कुशलता से साक्षात्कार करने लगी थीं. सुरैया अपनी आवाज का जादू बिखेर रहीं थीं. मीनाकुमारी के पास खूबसूरती और अभिनय का संगम था. इन सभी समकालीन मलिकाओं के होते हुए नरगिस ने अपने अस्तित्व का अनोखा अहसास दिखाया, अपने लिए स्वतंत्र स्थान बना लिया. विवाह के बाद उसनें परदे से तलाक ले लिया. तो उधर झांक कर भी नहीं देखा. पति की फिल्म यादें में उसका साया पर दिखाई दिया था. लेकिन रसिक दर्शकों ने साये को भी पहचान लिया था.
जब उस स्वप्न सुंदरी, जीवंत अभिनय की बेजोड़ प्रतीक, बहुमुखी प्रतिभा की धनी कलानेत्री नरगिस का 3 मई 1981 को देहावसान हुआ, तो उस समय ख्याति की जिस बुलंदी पर वह पहुंच चुकी थीं, किसी अन्य सम्मान की आवश्यकता उन्हें नहीं थीं. उस समय वह राज्य सभा की मनोनीत सदस्या थीं, पद्मश्री के अंलकार से विभूषित थीं. उन्हें अनेक फिल्मफेयर पुरस्कार अवार्ड, स्वर्ण-पदक-पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका था.
चित्रपट संसार के कला प्रेमियों के सामने जब उनकी प्रख्यात फिल्म मदर इंडिया का नाम आता है तो एक ममतामयी माँ, नरगिस का प्रभावशाली (मेकअप किया हुआ) प्रौढ़ चेहरा बरबस सामने आता है. जिसके ह्दय में एक गरीब पंरतु सशक्त स्वाभिमानी तथा न्यायप्रेमी भारतमाता (मदर इंडियां) की आत्मा के दर्शन होते है. जमींदार के अत्याचारों, कर्जो से व्यथित किसानों, भूख से पीडि़त मानव व वर्षों से अभाव में प्यासी धरती व भूखे पशुओं की दयनीय दशा की कहानी है. इस फिल्म में नरगिस ने एक प्रौढ़ता का ऐसा किरदार निभाया कि दांतो तले अंगुली दबानी पड़ती है. तब तक नरगिस का विवाह भी नहीं हुआ था. सुनील दत्त से उनके विवाह प्रसंग अथवा रोमांस का जन्म भी इसी फिल्म के फिल्माकंन के दौरान हुआ था. इसमें आग का एक सीन था लेकिन दुर्भाग्यवश आग इतनी भड़क गई कि उसनें विकराल रुप धारण कर लिया और नरगिस उसमें घिर गई. वे शायद उस आग का शिकार हो ही जाती, यदि सुनील दत्त ने अपनी जान पर खेलकर उसे बचाया ना होता. यही साहस और बलिदान देखकर नरगिस भी सुनील दत्त को अपना दिल दे बैठी और नरगिस से नरगिस दत्त बन गई.
वास्तव में नरगिस का नाम फातिमा रशीद था और माँ थीं जद्दनबाई, जो फिल्म निर्देशिका थीं. उन्हीं की संस्था में 5 वर्ष की आयु में ही एक फिल्म तलाशे हक में एक बाल कलाकार के रुप में इन्होंनें अपनी प्रतिभा का परिचय दिया. फिर नरगिस ने 14 वर्ष की उम्र में महबूब खान की फिल्म तकदीर में मोतीलाल जैसे कलाकार के साथ अभिनय किया. तकदीर सबको बहुत पसंद आई. उसके बाद नरगिस ने राज कपूर के साथ आह फिल्म में काम किया. फिर उन्होंने अंबर, मेला, अंदाज, आग, दीदार, जोगन, बाबुल, पापी, चोरी चोरी, हलचल, लाजवंती, अदालत, बरसात,श्री 420, मदर इंडिया आदि में अपने समकालीन प्रतिष्ठित नायकों दिलीप कुमार, राज कपूर, अशोक कुमार, प्रदीप कुमार, वलराज साहनी आदि के साथ काम किया. इनकी आखिरी फिल्म रात और दिन थीं, जिसमें उन्हें उत्कृष्ठ अभिनय के लिए उर्वशी एवार्ड से सम्मानित किया गया. नरगिस अंतराष्ट्रीय फिल्म समारोह में केन्द्रीय समिति में महिला अभिनेत्रियों के प्रतिनिधि के रुप में चयनित हुई थीं. मास्को में उनको राज कपूर की फिल्म श्री420 तथा परदेसी ने ख्याति दिलाई थीं.
नरगिस और राज कपूर के प्रसंग के बगैर यह आलेख अधूरा सा लगेगा, लेकिन इस प्रसंग को सीमित करने से सब बातें भी स्पष्ट नहीं हो पाएगी, इसलिए इसकी चर्चा कभी विस्तार से करेंगे.
रवि के. गुरुबक्षाणी.
गल्र्स स्कूल के सामने,स्ट्रीट न.5. रविग्राम तेलीबांधा, रायपुर छग 492006
मोबाईल-8109224468.

राज कपूर-नीली आँखों का जादूगर






स्मरण दिवस-2 जून पर विशेष----------------रवि के. गुरुबक्षाणी
उसकी आँखें नीली थीं और उन्हें वह दो तरह से इस्तेमाल किया करता था-पहला भोलेपन के लिए और दूसरे दुनिया भर के ख्वाबों की फसल उगाने के लिए. इन दोनों वाक्यों को घटित करने में वह अपनी तरह से कामयाब रहा. उसनें प्रेम का अपना गणित बनाया और हँसी में करुणा की अंर्तधारा का भी. वह खुद के गावदीपन से हँसा सकता था, मगर वह हँसी दर्द से फूटती लगती थीं. कंधे उचकाते हुए या बत्तख की तरह कदमों को दौड़ाते हुए उसनें जो मैनेरिज्म खड़ा किया था, वही उसकी हैसियत नहीं थीं. सपने बुनने में उसे महारथ हासिल थीं और उनके टूटने की सूरत में पैदा हुई पीड़ा को पेश करने में भी.
हमारी पीढ़ी ने जिस राजकपूर को देखा, वो बॉबी, सत्यम् शिवम् सुंदरम् प्रेम-रोग और राम तेरी गंगा मैली का राजकपूर था. और बड़ा सच यह है कि बॉक्स ऑफिस का गणित जैसा राकेश रोशन और यशराज फिल्मस् को आता है. वैसा ही गणित राजकपूर को भी आता था, यह बात अलग है कि वह अपने अलग आँकड़े इस्तेमाल करता था. और, इसमें हैरत नहीं कि अपनी सफलता के लिए हर आदमी को अपने फॉर्मूले ईजाद करने पड़ते हैं. राजकपूर ने मुहब्बत और औरत का फार्मूला ईजाद कर लिया था. जो आग वाले आर.के. के धुर प्रेमी है, उन्हें सत्यम शिवम सुंदरम के आर.के. को तौलने में मुश्किल नहीं होनी चाहिए.
राजकपूर सिर्फ समीक्षकों में जिंदा नहीं रहना चाहते थे. आजादी के तत्काल बाद नव निर्माण की जद्दोजहद में लगे लोगों के बीच रुमानियत का स्वप्नशील संसार देने और विचारों का फ्लैवर इस्तेमाल करने का सूत्र उसनें पकड़ लिया था. निर्दोष भारतीय चरित्र की प्रतिनिधि छबि को अपनाने का गुर उसे समझ में आ गया था. वह औसत आदमी का दर्द सेल्यूलाइड पर उतारने में बेजोड़ साबित हुआ.
दरअसल राजकपूर यथार्थ तो पेश करना चाहता था, मगर उसमें अपनी ऐसी छबि की स्थापना का मकसद भी शामिल था जो उसे स्टार का दर्जा भी दे सके. उसके लिए भले ही उसे चार्ली चैपलिन की शैली उठा लेनी पड़ी. जागते रहो का राजकपूर अद्भुत राजकपूर है, लेकिन उसकी व्यावसायिक असफलता से दुखी, बॉक्स ऑफिस के लिए तमाम जतन करता हुआ भी एक राजकपूर है. बरसात से राजकपूर ने सेक्स और संगीत का संयुक्त फॉर्मूला इस्तेमाल करना शुरु किया था. यह धीरे-धीरे गंगा मैली तक अनुपातिक रुप से और इस्तेमाल की दृष्टि से बदलता चला गया. दिलचस्प यह है कि राजकपूर ने अपने गुरु अब्बास की प्रगतिशीलता को स्वीकार कर लिया लेकिन नरगिस की कमर से उनका हाथ नहीं छूटा.
इसमें तो कोई शक नहीं कि राजकपूर में विलक्षण प्रतिभा थीं. लेकिन उस प्रतिभा का इस्तेमाल करते हुए उस पर रोजी रोटी और सिताराई ख्वाहिशें शामिल थीं. बेशक शीरी 420, आवारा और जागते रहो हर हाल में पूरी तरह से आदर के साथ उल्लेखित होगी, बूट पालिश के लिए बतौर निर्माता आर.के. को सम्मान के साथ याद किया जाएगा. तीसरी कसम के हीरामन को जीने वाले अभिनेता को कोई कम नहीं आंक सकता ( राजकपूर की इस भारी ऊँचाई में मुकेश, शंकर-जयकिशन, शैंलेद्र-हसरत, अब्बास और राधू कर्माकर, वी.पी. साठे को कद भी शामिल है. अगर अब्बास न मिले होते तो आर.के. का रोमांस, महज रोमांस से ऊपर कुछ नहीं होता.)
मगर राजकपूर के सिनेमा का जो उत्तरार्ध सच है, वह एक लोकप्रिय सितारे, एक यथार्थ को सपने में मिलाकर सम्मोहित करने वाले चतुर निर्देशक और जेब के लिए पूरा ख्याल रखने वाले निर्माता का सच है.
संगम की वैजयंतीमाला का स्विमिंग सूट, जोकर की सिमी की टांगे, जिस देश में गंगा बहती है की पद्मिनी का स्नान, बॉबी की डिम्पल की बिकनीं, सत्यम शिवम के झरनें में नहाती जीनत और गंगा मैली की दूध पिलाती-नहाती-बुलाती मंदाकिनी ये सब राजकपूर की दी हुई हैं. लोग तर्क देते हैं कि तुम्हें मंदाकिनी और डिम्पल अश्लील क्यों लगती हैं? मैं सवाल करता हूँ पोस्टर पर और प्रचार में बिकनी और झरना स्नान ही क्यों दिखाया जाता है? और फिर तुम्हारा मकसद इस उद्घोष से समन्वित बताया जा रहा हो कि नदी और नारी की उदात्तता की कहानी है, तब दर्शक को सिर्फ मंदाकिनी का स्नान ही याद रहता है?
पंडित नेहरु ने एक बार राजकपूर और दिलीपकुमार को भारत माता की दो आँखें कहकर संबोधित किया था. सोवियत संघ में पं. नेहरु के बाद सर्वाधिक लोकप्रियता राजकपूर को मिली थीं. राजकपूर की फिल्म आवारा और शीरी 420 सोवियत संघ के सिनेमा घरों में बगैर रुके लगातार 2 साल चलीं थीं. चीन के राष्ट्रपति माओत्से तुंग की मनपसंद फिल्म आवारा थीं. आवारा के 18 भाषाओं में संस्करण रुस, मध्यपूर्व, चीन और जापान के लिए जारी हुए थे. प्रथम अंतरिक्ष यात्री गगारिन जब भारत आए तो उन्होंने राजक पूर का अभिवादन आवारा हूँ कह कर किया था. बहरहाल, यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि जोकर राजकपूर अलग राजकपूर था. उसके बाद जोकर की असफलता से पराजित महसूस करता हुआ राजकपूर बॉबी में अपने पुराने मूल्यों को अलग कमरे में बंद करके चाबी खो आया. उसकी नीली आँखों में अभिनय के लिहाज से भरपूर भोलापन था, मगर उन्हीं आँखों के पीछे एक लोकप्रिय स्टार, सफल निर्देशक और व्यावायिक दिमाग वाले निर्माता की बॉक्स ऑफिसीय दृष्टि भी लगातार मौजूद थीं. और यहीं, उन आँखों का सच भी था.

हिमांशु राय ने दी भारतीय सिनेमा को नई पहचान





स्मरण दिवस-19 मई पर विशेष---------रवि के. गुरुबक्षाणी
हिमांशु राय भारतीय सिनेमा के इतिहास में कभी ना भुलाया जाने वाला नाम है. दादा साहेब फालके, आर्देशर ईरानी, हीरालाल सेन, और व्ही. शांताराम की तरह हिमांशु राय की भी भारतीय सिनेमा के विकास में अहम भूमिका रहीं है. भारतीय सिनेमा से वे उस समय जुड़े जब शुरुआती दौर था. संघर्ष चल रहा था. हिमांशु ने भारतीय सिनेमा को विदेशों तक पहचान कराई. पूरे विश्व को अहसास कराया कि भारतीय सिनेमा उनस ज्यादा पीछे नहीं है. उनकी मूक फिल्म दि लाइट आफ एशिया इंगलैंड में नौ महीने चली थीं.
विश्व सिनेमा में भारत की सबसे पहले पहचान कराने वाले हिमांशु का जनम बंगाल में हुआ था. घर का थियेटर होने के कारण हिमांशु को कला के प्रति रुझाम बचपन से ही हो गया था. वकील बनाने के लिए पिता ने उन्हें इंगलैंड उच्च शिक्षा के लिए भेजा. वकालत के साथ साथ हिमांशु ने वहां पर रंगमंच से भी रिश्ता बना लिया. लंदन में भारतीय लेखक निरंजन पाल के नाटक द गाडेस में हिमांशु ने मुख्य भूमिका निभाई जो बहुत पसंद की गई थीं.
उन्हीं दिनों उनके दिमाग में विश्व के महान ग्रंथों पर फिल्मों की एक सीरिज बनाने का काम आया. उन्होंने 1924 में म्यूनिख की एक कंपनी एमेवेका को इसके लिए साझीदार बना दिया. एडविन आरनोल्ड के काव्य दि लाइट आफ एशिया के आधार पर भगवान बुद्ध के जीवन पर फिल्मांकन किया गया. इसमें गौतम बुद्ध की भूमिका स्वयं हिमांशु ने निभाई और यशोधरा की भूमिका दी गी 23 वर्षीय सीतादेवी (वास्तविक नाम-रेनी स्मिथ) को. निर्देशन किया जर्मनी के फ्रेज आस्टिन ने. यह फिल्म भारत की अपेक्षा विदेशों में ज्यादा चलीं. मध्य यूरोप में इसने धूम मचा दी थीं. लगातार नौ महीने चलकर इसने कीर्तिमान स्थापित कर दिया. विश्व स्तर पर दि लाइट आफ एशिया की व्यावसायिक सफलता को देकर कई फिल्मकारों ने हिमांशु के सामने फिल्में बनाने के प्रस्ताव रखें. सन 1926 में हिमांशु ने जर्मनी की एक फिल्म कंपनी के सहयोग से शिराज नाम की फिल्म का निर्माण किया. फिल्म का कथानक विश्व प्रसिद्ध ताजमहल से सम्बंधित था. फ्रांज आस्टिन निर्देशित इस फिल्म में उनकी नायिका थी सीता देवी. सीतादेवी इस फिल्म में मुमताज बनीं थीं. यह फिल्म भी काफी सफल रहीं थीं. भारत, इंगलैंड और जर्मनी के अलावा अन्य देशों में भी इस फिल्म ने अपनी सफलता के झंडें गाढ़ दिये थे.
तीन साल बाद 1929 में हिमांशु राय ने इंगलैंड और जर्मनी की कम्पनी की मदद से ए थ्री आफ डायस फिल्म का निर्माण किया. फ्रांज आस्टिन द्वारा ही निर्देशित इस फिल्म के निर्माण के दौरान हिमांशु राय व देविका रानी इतने निकट आ गए कि फिल्म पूरी होते होते दोनों का रिश्ता कलाकारों के बजाए पति-पत्नि का बन गया था. शिराज ने अच्छी खासी व्यावसायिक सफलता हासिल की थीं. इसके बाद हिमांशु राय ने इंग्लिश कम्पनी के साथ मिलकर पहली सवाक फिल्म कर्म का निर्माण देविका रानी को लेकर किया. कर्म को अपार सफलता मिलीं. हिमांशु राय के सामने पैसों का ढेर लग गया. हिमांशु राय ने समझदारी दिखाते हुए सन 1964 में बम्बई के मालाड में आधुनिक उपकरणों से युक्त बाम्बे टाकीज की स्थापना कर डाली. थोड़े से समय में बाम्बे टाकीज का नाम चारों तरफ फैल गया. इतना नाम बढ़ा कि इसका नाम ही अच्छी फिल्मों की जमानत बन गया.
बाम्बे टाकीज की पहली फिल्म थीं-जवानी की हवा. नजम और देविका रानी इसमें नायक नायिका थे. यह पहली फिल्म थी जिसमें पहली बार पाश्र्व गायन का प्रयोग किया गया. सन 1935 में बाम्बे टाकीज के लैब अस्टिस्टेंट अशोक कुमार का नाम नायक के रुप में उभरा. दरअसल हुआ यूं कि नजम अचानक बंबई से बाहर चले गए. चूंकि हिमांशु राय काफी अनुशासन व काम के पाबंद थे इसलिए वह अपनी फिल्म जीवन प्रभात के लिए नजम का इंतजार नहीं कर सकते थे. अत: उन्होंने अशोक कुमार को फिल्म का नायक बना दिया. हिमांशु राय का चयन सार्थक रहा. फिल्म बेहद सफल रहीं.

सन 1936 में हिमांशु राय ने छूआछूत के जैसे ज्वलंत विषय पर अछूत कन्या बनाई. ब्राम्हण लड़के व अछूत लड़की की प्रेम कहानी वाली इस फिल्म ने समाज के ठेकेदारों में खलबली मचा दी. बाक्स आफिस पर इस फिल्म ने शानदार सफलता हासिल की. इसके बाद बाम्बे टाकीज के बैनर तले सामाजिक विषयों से सम्बंधित कई फिल्मों का निर्माण हुआ.
हिमांशु राय को साहित्य के प्रति गहरा लगाव था. वह अक्सर स्तरीय कहानियों की तलाश में रहा करते थे. मुंशी प्रेमचंद, कवि नरेंद्र शर्मा, शाहिद लतीफ, इस्मत चुगताई, पंडित प्रदीप, निरंजन पाल, गोपाल सिंह नेपाली जैसी प्रसिद्ध हस्तियां काफी लम्बे समय तक बाम्बे टाकीज से जुड़ी रहीं. नए कलाकारों को मौका देने में हिमांशु राय कभी पीछे नहीं रहे. देविका रानी, देवी, अशोक कुमार, लीला चिटनीस, एस.मुखर्जी, ख्वाजा अहमद अब्बास, अमिय चक्रवर्ती जैसी हस्तियों को हिमांशु राय ही सामने लाए. हिमांशु राय दिन-रात फिल्मों की बेहतरी के लिए सोचते रहते थे.
सिर्फ छह वर्ष में ही बाम्बे टाकीज की उन्होंने विशिष्ट पहचान बना दी थीं. इसको और बड़ा आकार देने की योजना वे बना ही रहे थे कि 19 मई 1940 को सिर्फ 45 वर्ष की उम्र में उमका निधन हो गया. इतनी छोटी सी उम्र में उन्होंने जो उपलब्धियां हासिल की थीं, वह किसी अजूबे से कम नहीं थीं. आज भी पुराने लोग हिमांशु राय और बाम्बे टाकीज के चर्चे गर्व से किया करते हैं.

मोहन माखीजानी से बने थे मैक मोहन



विदाई आलेख-------रवि के. गुरुबक्षाणी
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मैक मोहन अब नहीं रहे जैसे ही यह समाचार सुना दिल धक से रह गया क्योंकि मैक मोहन से मेरी बातें उनकी ई-मेल आईडी सांभा एट दि रेट जीमेल डॉट काम पर होती रहती थीं.
नवभारत की तरफ से उनकी सुपुत्री विनती से बात हुई मोबाइल न. 09820227232 पर. उन्होंने बताया कि वे साल भर से कैंसर की लाईलाज बीमारी से पीडि़त थे. उनकी आखिरी फिल्म अतिथि के लिए बात चल रही थी पर वे नहीं कर पाए. फिल्मकारों के अनुसार वे जिदांदिल इंसान थे.
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मैक मोहन भले ही सांभा के पात्र के नाम से जाने पहचाने जाते रहे हो पर हर फिल्मकार जानता है कि वे अभिनय के प्रति समर्पित कलाकार थे. रंगमंच से लेकर फिल्मों तक की यात्रा में उन्होंने हमेशा अभिनय में कमाल की योग्यता दिखाई थीं. शोले से शुरुआत करते है. इस फिल्म में मैकमोहन का सिर्फ चार शब्दों का डायलाग था-सरदार सिर्फ 2 आदमी थे. और इन चार शब्दों ने मैक मोहन को देशभर में सांभा नाम से अमर कर दिया. सिर्फ चार शब्दों के डायलाग पर इतनी ख्याति मिलना उल्लेखनीय घटना है फिल्मी इतिहास में.
मैक मोहन मूलत: चरित्र अभिनेता थे. उन्होंने 200 के लगभग फिल्में की थीं. मैक मोहन की पहली फिल्म हकीकत थीं. जो 1962 के भारत-चीन युद््ध पर बनी चेतन आनंद की प्रसिद्ध फिल्म थीं. 1964 में प्रदर्शित इस फिल्म में मैक मोहन ने राम स्वरुप के छोटे भाई की भूमिका अभिनित की थीं. फिल्म में मैक मोहन की भूमिका सभी ने सराही थीं. ज्यादातर फिल्मों में उन्होंने नकारात्मक भूमिकाएं की थीं. इसकी वजह उनकी दाढ़ी थीं जो उन्हें बहुत प्रिय थीं. वे चाहते थे कि वे अपनी प्रिय दाढ़ी के बिना फिल्में ना करे और यही दाढ़ी का शौक उन्हें सकारात्मक भूमिकाओं से परे ले गया.
अपने परिवार के बारे में उन्होंने बताया था-मेरे पिता जो सेना में ऊँचे पद पर थे. वे चाहते थे कि मैं भी सेना में जाऊँ कितुं उन्होंने मुझ पर कभी अपनी पसंद कभी लादी नहीं. उन्होंने मुझे खुली छूट दी कि जो भी करना है इज्जत के साथ करो. मेरी पसंद फिल्में थी इसलिए मैं फिल्मों में आ गया. मेरे किरदार को हीरो से पिटना लिखा है तो पिटता ही रहा हूँ..
मैक मोहन नाम का राज क्या है--ऐसा है हम लोग सिंधी हैं. जब पिताजी इंगलैंड गए तो माखीजानी से अंग्रेजों ने मैक जानी कर दिया. माखीजानी को वे मैक जानी पुकारने लगे. बस फिर हम भी बन गए मोहन माखीजानी से मैक जानी. फिर हमने नाम के मैक मोहन रख दिया. इस प्रकार सेना के अफसर का बेटा बुरा आदमी (फिल्मों में) बन गया. अभिनय की बारीकियां मैक मोहन ने फिल्माया स्टूडियों में सुबोध मुखर्जी से सीखी. वे तब संजीव कुमार जी के बैच में थे. उनकी पहली फिल्म में उन्होंने इंद्राणी मुखर्जी के देवर का रोल किया जो सराहा गया था. चेतन आनंद के साथ उन्होंने सह-निर्देशक का काम भी देखा था फिल्म आखिरी खत के दौरान. मैक मोहन क्रिकेट के स्टेट लेवल खेल चुके थे और बहुत अच्छे क्रिकेटर माने जाते थे. उनकी पढ़ाई लिखाई लखनऊ में और मुंबई में हुई थीं. मैक मोहन का पसंदीदा रोल फिल्म आया सावन झूम के का है. इस फिल्म में उन्होंने एक पागल प्रेमी का रोल निभाया था जो प्रेमिका के धोखा देने के बाद सुध-बुध खो बैठता है. इस रोल के निभाने से पहले मैक मोहन 2 दिन तक पागलखाने में रहे थे. मैक मोहन कभी भी लीडिंग विलेन नहीं बन पाए क्या इसका उनको मलाल था तो जवाब है बिल्कुल नहीं क्योंकि वे खुद को कदकाठी के कारण इस लायक नहीं समझते थे. उन्होंने हालीवुड की कुछ फिल्में भी की थीं. मशहूर निर्देशक केविन की फिल्म मिस्ट्री आफ डार्क जंगल में मैक मोहन थे. मैक मोहन की पत्नी पेशे से डाक्टर है. वे अपने पीछे 2 लड़कियां और 1 सुपुत्र छोड़ गए हैं.
मैक मोहन की मशहूर फिल्मों में शोले, जंजीर, मजबूर, दीवार, मेमसाब, सुहाना सफर, कसौटी, सलाखें, प्रेम रोग, डॉन, खून पसीना, हेरा फेरी, जानी दुश्मन, काला पत्थर, कर्ज, टक्कर, कुर्बानी, अलीबाबा और चालीस चोर, लक बाई चांस आदि शामिल है.

Sunday, March 21, 2010

लौट आओ मीना, तुम कहां हो...?






























कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता
दर्द की देवी मीना कुमारी की अमर कहानी
मेरे ही ख्वाब मेरे लिए जहर बन गए मेरे तसव्वुरात ने डस लिया मुझे
-----३१ मार्च- स्मरण दिवस पर विशेष---
मीना कुमारी भारतीय सिने इतिहास की एक ऐसी अदाकारा थीं, जिनके खामोश होठों और अनकहे आसुंओं की भाषा कोई नहीं समझ पाया. चार दशकों तक गमजदा जिदंगी का बोझ उठाने के बाद वे इस दुनिया से चली गई और छोड़ गई अपने पीछे तन्हाइयों की एक लंबी कविता. मीना कुमारी ऐसी बदनसीब तारिका थीं जिसे हर किसी ने ठगा...अपनों ने भी और परायों ने भी...उन्हें न तो मां बनने का सुख मिला, न ही वह कभी पत्नी का सुख पा सकीं. चार दशकों तक वह इसी सुख की तलाश में भटकतीं रहीं. वे परदे पर अभिनय को जीती थीं, और निजी जिदंगी में दर्द को...जिदंगी के इसी दर्द ने ही उन्हें शायर बना दिया था.
अभिनय और सुदंरता का संगम. जैसे खुशबू और खूबसूरती सिमट कर गुलाब में जा बसी हैं उसी तरह अभिनय और नीर-क्षीर की तरह बसी थी मीना कुमारी में. आज मीना कुमारी को हमसे जुदा हुए 38 साल गुजर चुके हैं. इन 38 सालों में इंडस्ट्री में कई अभिनेत्रियां आईं और गईं. आनेवाली हर अभिनेत्री मीना कुमारी बनने का सपना लेकर आतीं है और थोड़ा बहुत नाम कमाकर लौट जाती है. वे सब कुछ बनीं पर मीना कुमारी न बन सकीं. मीना कुमारी ने जो अपनी अभिनय क्षमता और सुदंरता से जो गगनचुंबी इमारत खड़ी की है. आज की अभिनेत्रियां उस इमारत को शिखर करने का सपना देखतीं है. हर सपना मीना कुमारी और पाकीजा पर आकर ही दम क्यों तोड़ देता है? इसलिए कि ये दोनों फिल्म इंडस्ट्री को मिली ऐसी विरासतें हैं जिनको पीढिय़ां गुजर जाने के बाद भी याद रखा जाएगा.
मीना कुमारी एक महान अभिनेत्री और नारी की त्रासदी की प्रतीक थीं. ये शब्द किसी बंबईयां फिल्म की प्रचार सामग्री का हिस्सा लगते हैं. लेकिन कई बार ऐसा भी हुआ है कि हम निहायत ही सादा शब्दों में किसी असीम शख्सियत को अभिव्यक्त कर देते हैं. लगभग दो दशकों तक हिन्दी सिनेमा की चोटी की अभिनेत्री रही मीना कुमारी की निजी जिदंगी, उनकी वैवाहिक त्रासदी, रिश्तेदारों द्वारा किया गया शोषण, प्यार की अबुझ प्यास, आत्मघाती मदिरापान तथा एक शायरा के रुप में उनके मूल्यांकन आदि के बारे में विवादों की कमी नहीं रही. लेकिन इस बारे में कोई दो राय नहीं कि मीना कुमारी जैसी बेमिसाल और बेहतरीन फनकार आनेवाले कई दशकों में देखने में नहीं आएगी.

मीना कुमारी जैसी अभिनेत्री की कला का आंकलन करने से पहले महान अभिनय को थोड़ा परिभाषित करना जरुरी है. यों तो परिभाषाएं बनाना भी आसान नहीं है लेकिन ख्वाजा अहमद अब्बास के इस कथन में काफी दम है कि सच्चा अभिनय वह है कि जब आपको लगे कि व्यक्ति अभिमय कर ही नहीं रहा है. प्रसिध्द अग्रेंजी समीक्षक सी.ई.मांटेगयू ने अभिनय के तीन तत्व बतलाएं है सुनम्य (प्लास्टिक) भौतिक माध्यम, परिष्कृत तकनीक
लगा. लेकिन कोहिनूर, शरारात और आजाद में उन्होंने हास्य भूमिकाएं भी की. शोहरत और दौलत उनके कदम चूमने लगीं. सच तो ी चालाकी और जिस पात्र का अभिनय किया जा रहा है उसके भीतर उतरने का आनंद. पहले के अंतर्गत हम शरीर को या किन्हीं विशिष्ट अंगों के उपयोग को लेते है.
चार्ली चैप्लिन की तरह अपने समस्त शरीर का उपयोग करने वाले अभिनेता बहुत कम होते है लेकिन मीना कुमारी ने अपने अभिनय के दौरान अपनी आँखों का भरपूर फायदा उठाया. अपनी आँखों से ही वे करुणा, दर्द, पाकीजगी, प्यार, नाराजगी तथा मदहोशी भी इतनी सहजता से व्यक्त कर जाती थीं कि उनके साथ अभिनय करते हुए कई तपे हुए कलाकार तक डगमगा जाते थे. एक निर्देशक के अनुसार तो उनकी आँखों के सामने दिलीप कुमार तक विचलित हो जाया करते थे.
बतौर बाल कलाकार मीना ने कुछ फिल्में कीं. इसके बाद बतौर नायिका मीना ने बच्चों का दिल, मदहोश, मूर्ति, दुनिया एक सराय आदि से शुरुआत की लेकिन बात बनी नहीं. बैजू बावरा की सफलता क बाद मीना कुमारी के कैरियर में एक नया मोड़ आया. शारदा, एक ही रास्ता, परिणीता, फूल और पत्थर, मंझली दीदी, नूरजहां, साहब बीवी और गुलाम के साथ ही वे अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाती गई. जल्द ही उसे ट्रेजिडी क्वीन कहा जाने यह है कि अगर मीना अपने चेहरे पर मेकअप नहीं चढ़ाती तो अली बख्श का परिवार दरिद्रता के सागर में डूबता उतरता रहता, मीना ने इस परिवार के दुख दर्द को अपनी मेहनत से सुख शांति में तब्दील कर दिया था. इसके बाद मीना के जीवन में पाकीजा फिल्म का आगमन हुआ. इस फिल्म ने मीना कुमारी को वह ऊंचाई दी जिसके लिए कलाकार जिदंगी भर तरसता है. मीना कुमारी और कमाल अमरोही इस फिल्म की वजह से अमर हो गए. ऐसा नहीं है कि मीना कुमारी के जीवन में पाकीजा के अलावा कुछ नहीं है. बैजू बावरा, चित्रलेखा, परिणिता, दुश्मन, मेरे अपने में भी उनकी भूमिकाएं अपना अलग प्रभाव छोड़ती हैं. मेरे अपने में गुलजार ने उनकी प्रतिभा को सही रुप से बाहर निकाला. सही मायने में मेरे अपने की बूढ़ी औरत का किरदार मीना द्वारा निभाए गए किरदारों में काफी ऊपर रखा जा सकता है.
दुश्मन का रोल हालंाकि केन्द्रीय नहीं था लेकिन फिल्म देख कर बाहर निकलते समय वहीं किरदार जेहन पर याद रहता है. दुश्मन में मीना के बहुत ज्यादा संवाद नहीं थे. सिर्फ उनकी आँखें और चेहरे के भाव ही थे जिन्होंने किरदार में जान डाल दी थीं. इसी तरह साहब बीवी और गुलाम में निभाया छोटी बहू का किरदार सही मायनों में चुनौतीभरा और उलझा हुआ किरदार था. उम्मीद नहीं था कि मीना कुमारी को दर्शक इस रुप में स्वीकार करेंगे. छोटी बहू का किरदार बाद में उनकी जिदंगी पर बुरी तरह छा गया था. उसी तरह चित्रलेखा किरदार . आमतौर पर देखा गया है कि दो बार बनीं फिल्मों में दूसरी बार बनीं फिल्म वह पकड़ नहीं रख पाती जो पहली में होती है. यही बात उस फिल्म के रिकरदारों पर भी लागू होती है जो इनमें काम कर रहे होते है. बहुत कम कलाकार इस चक्र को तोड़ पाए हैं. इन कलाकारों में मीना कुमारी और दिलीप कुमार के नाम खास तौर पर लिए जा सकते हैं. दिलीप कुमार ने देवदास द्वारा अपने को सिध्द किया. पहले बनीं देवदास में के..एल.सहगल थे. इसी तरह मीना ने चित्रलेखा में अपने में आपको साबित किया. पहले बनी चित्रलेखा में उसकी मशहुर अदाकारा महताब थीं. महताब उस फिल्म से जिस ऊंचाई पर पहुंची थीं, उससे कम ऊंचाई परमीना कुमारी भी नहीं थीं. यह मीना के अभिनय का कमाल था. उन्होंने जिस भूमिका को निभाया उससे उसे प्यार हो गया. उनके सशक्त अभिन. का प्राण उनकी आँखें और संवाद अदायगी थीं. उनकी आवाज में एक कशिश थीं. एक दर्द था. सच तो यह है कि मीना कुमारी एक ऐसी अभिनेत्री थीं, जिन्होंने कभी अभिनय तो किया ही नहीं. अभिनय का आधा काम तो उनकी आँखें कर देती थीं. फिल्म आरती का वह सीन इसकी मिसाल है . जिसमें प्रदीप कुमार और मीना कुमारी एक दूसरे को देख रहे होते है और बैक ग्राउंड में कभी तो मिलेगी..बहारों की मंजिल राही.. गाना बज रहा होता है. हालांकि वह युग गला काट प्रतियोगिता का नहीं था, तब भी प्रतिस्पर्धा तो थी ही. एक से एक आला दरजे की अभिनेत्रियां मीना के सामने थीं. मधुबाला जैसी सुंदर, नरगिस जैसी भावप्रणव अभिनेत्रियों के साथ शुध्द प्रतिस्पर्धा के जरिए अपना मकाम बनाना आसान नहीं था.
कमाल अमरोही के साथ उन्होंने घर से विद्रोह करके निकाह किया था. कमाल आजाद ख्यालों की मीना को परदे में रखना चाहते थे. पर मीना को यह मंजूर न था. लिहाजा दोनों में तलाक हुआ. इस अलगांव ने मीना को तोड़ दिया. प्यार की इसी प्यास ने उसे विद्रोही बना दिया. वे जानकी कुटीर में रहने आ गई. अब उनके साथी थे शराब, सिगरेट और शायरी. अभिनय के साथ शायरी भी उनके खीन में थीं. मीना के नाना प्यारेलाल शाकिर मेरठवी शायर थे. मीना कुमारी की शायरी में एकांत, वीराना और दिल टूटने की खनक साफ सुनाई देती है-
न जाने किसके चटखने की
यह आवाज आई
और एहसास दरारों में
कैसे पहुंचा
नगर वीरान झरोखे खामोश
मुंडेरे चुप
खामोशी
उफ कि खलाओं का
दम घुटने लगा...

मोहब्बत की तलाश ने मीना को एक ऐसी अंधेरी जगह तक पहुंचा दिया जहां सब कुछ सुनसान था.अकेलापन, अंधेरा, इस अंधेरे में भी प्यार का जलता दीपक लेकर बैठी रहीं. कभी तो आएगा कोई तो आएगा. या मोहब्बत आएगी या मौत आएगी. मीना की शायरी में मोहब्बत और मौत को एक ही नाम दिया गया है. दोनों से ही मीना को प्यार था-
हर एक मोड़ पर बस
दो ही नाम मिलते है
मौत कह लो जो
मोहब्बत नहीं कहने पाओ.

लेकिन मोहब्बत की तलाश में उनके हाथ लगी नाकामियां बदनामियां और न जाने क्या क्या...प्यार उनके लिए छलावा सिध्द हुआ, वे एक ऐसे रास्ते पर आगे बढ़ती जा रहीं थीं जिसकी कोई मंजिल नहीं थीं. उनकी चाह ही उनके लिए नासूर बन गई. मीना ने यह बात कितने दर्द के सात लिखी है-
मेरे ही ख्वाब मेरे लिए
जहर बन गए
तेरे तसव्वुरात ने
डस लिया मुझे...

प्यार में मीना कुमारी बुरी तरह नाकाम रही. प्यार के हर सिलसिले का अंत दिल तोडऩे वाला निकला. चाहे यह सिलसिला परिवार के साथ हो, या कमाल अमरोही के साथ हो या किसी और के साथ. इस छलावे को मीना ने महसूस किया-
कहां शुरु हुआ यह
सिलसिला कहां टूटे
न इस सिरे का पता है
न इस सिरे का पता

आज हमारे बीच मीना नहीं है. हमारे बीच जो है उनमें अधिकांश व्यावसायिक रवैये वाली अभिनेत्रियां है.ऐसे में मीना कुमारी की याद शिद्दत के साथ आती है. क्या अब कोई मीना पैदा होगी? शायद नहीं, बेहतर है मीना वापस आ जाए. लौट आओ मीना ...तुम कहां हो...?


मीना कुमारी एक नजर में
मीना कुमारी का असली नाम महजबीं था.
मीना कुमारी के पिता अलीबख्श, मां इकबाल बेगम तथा दो बहनें माधुरी और खुर्शीद थीं.
मीना कुमारी के पिता अलीबख्श उर्दू नाटक कम्पनी में हारमोनियम बजाया करते थे.
मीना कुमारी के नाना प्यारेलाल शाकिर मेरठवी के नाम शायरी किया करते थे.
मीना कुमारी को 1954 में बैजू बावरा के लिए पहली बार फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला.
मीना कुमारी को जानवरों से बहुत डर लगता था. वे कुत्ते, बिल्ली और चूहों से डरती थी.
दिलीप कुमार के साथ ने अमर में काफी सारा काम किया, लेकिन बाद में फिल्म मधुबाला को लेकर बनीं. दिलीप कुमार के साथ मीना कुमारी ने फुटपाथ, कोहिनूर, यहूदी आजाद आदि में काम किया.
मीना कुमारी बुधवार के दिन को बड़ा अपशकुनी मानतीं थी.
मीना कुमारी को पत्थर जमा करने का बड़ा शौक था. पंडित नेहरु और लाल बहादुर शास्त्री के पास के पत्थर भी उनके यहां मौजूद थे.
मीना कुमारी को पान खाने का शौक था. वे बहुत ज्यादा पान खाती थीं.
मीना कुमारी अच्छी शायर भी थीं. उनकी लिखी कुछ गजलों को मशहूर लेखक-निर्देशक गुलजार ने मीना कुमारी की शायरी नामक पुस्तक में सम्पादित किया है.
मीना कुमारी को अंधेरे और एकांत से बहुत प्यार था. जब तब वे लाइट आफ करके खिड़की के पास खड़ी रहती थीं.
मीना कुमारी को हर चीज में नमक डालकर खाने की आदत थीं. चाय, दूध, लस्सी, कोकाकोला आदि में वे नमक डालकर उपयोग करतीं थी.

मजहबीं से मीना

फिल्म एक ही भूल के दौरान मजहबीं से मीना का नाम मीना कुमारी हुआ. फिल्म के निर्माता ने मीना को कामिनी, प्रभा, विमला और मीना में से किसी एक नाम को चुनने के लिए कहा, इनमें से मीना नाम चुना गया. बाद में इसमें कुमारी और जोड़ दिया गया. बाल अभिनेत्री के रुप में मीना ने फर्ज ए वतन, लेदर फेस, एक ही भूल, बहन, गरीब की पूजा, प्रतिज्ञा, लाल हवेली कसौटी आदि फिल्में कीं.
उंगली का कटना

मीना कुमारी के बचपन की एक घटना है. उस समय उनकी उम्र मुश्किल से 8-9 साल की रहीं होगी. मीना कुमारी परिवार के साथ पंजाब स्थित अपने गांव जा रहीं थी. ट्रेन ने एक बोगदे के अंदर प्रवेश किया और एकदम अंधेरा छा गया. ढ़ेर सारी धूल और धुंआ कम्पार्टमेंट के अंदर घुस गया. मीना ने जल्दी से खिड़की बंद की. लेकिन इसी बीच उनकी अंगुली खिड़की में फंस गई. अंधेरे में उनकी मां और बहन को कुछ समझ में नहीं आया कि मीना क्यों चीखी. जब ट्रेन बोगदे से बाहर निकली तब पता चला कि मीना की उंगली कट गई है.
शराब का सहारा

जानकी कुटीर में आकर मीना निहायत अकेली हो गई. उनको लगा कि लोग उनसे नहीं उनके पैसे से प्यार करते हैं. प्यार की प्यास ने मीना कुमारी को दो नए साथी दिए, शराब और सिगरेट. उनके प्यार और रोमांस के सच्चे-झूठे किस्से जानकी कुटीर में ही जवान हुए. रात-दिन चिंता के कारण मीना बीमार पड़ गई और आखिर उन्हें लंदन जाना ही पड़ा.
कमाल अमरोही से प्यार
मीना महा बलेश्वर से बम्बई आ रहीं थी, इसी बीच उनकी कार का एक्सीडेंट हो गया. मीना को पूना के एक अस्पताल में दाखिल कराया गया. चार दिन बाद फिल्म अनारकली के निर्माता के साथ कमाल अमरोही आए. निर्माता मीना के पिता से मिलने गए. कमरे में मीना और कमाल अमरोही रह गए. कमाल साहब ने टेबल पर रखा जूस का गिलास उठाया और मीना को पिलाया. दोनों की नजरें मिली और प्यार हो गया. बाद में कमाल ने मीना से निकाह किया. भिंडी बाजार के एक मकान में हुआ यह निकाह लंबे समय तक गुप्त रहा.
अफवाहें

मीना कुमारी का नाम अपने दिनों में हर एक्टर से जुड़ा. दरअसल मीना में एक सम्मोहन था. जो हर मर्द को आकर्षित कर लेता था. वैसे उनके साथ प्रदीप कुमार, धर्मेन्द्र और भारत भूषण के साथ जुड़ा था. प्रदीप कुमार के अनुसार साथ काम करके हम काफी करीब आ गए थे. सच तो यह है कि मैं उनके निकटतम मित्रों में से एक था. इस मित्रवत सम्बंध को लोग समझ गए होंगे. पर इसका मुझे अंदाजा नहीं था.
अलगांव

कमाल अमरोही और मीना का साथ ज्यादा दिन नहीं चला. दोनें के बीच दरार आ गई. आखिर मीना ने कमाल अमरोही का साथ छोड़ दिया. वे जानकी कुटीर में रहने आ गई. उस समय मशहूर फिल्म पाकीजा निर्माणाधीन थीं. यह 1964 की बात है. मीना-कमाल के अलगाव से लगा कि अब शायद ही पाकीजा पूरी हो पाए. लेकिन इस अलगाव के बाद भी किसी तरह फिल्म पूरी हो गई.

मीना कुमारी की कविताएं

१.
ये सिलसिले कहाँ टूटे

कहाँ शुरु हुए
कहाँ टूटे
थका थका सा बदन
आह रुह बोझल बोझल
कहाँ पे हाथ से
कुछ छूट गया याद नहीं
न जाने किसके चटखने की
ये आवाज आई
और अहसास दरारों में
कैसे जा पहुंचा
नगर विरान
झरोखें खामोश
मुंडेरें चुप
खामोशी, उफ्फ
कि खलाओं का दम भी घुटने लगा
अचानक आ गई हो मौत
वक्त को जैसे
हाय रफ्तार की नब्जें रुकी,
दिल बैठ गए
ये सिलसिले कहाँ टूटे
न इस सिरे को पता है
न उस सिरे को पता.

२.
टुकड़े-टुकड़े

टुकड़े टुकड़े दिन बीता
धज्जी धज्जी रात मिली
जिसका जितना आंचल था
उतनी ही सौगात मिली.
जब चाहा दिल को समझें
हँसने की आवाज सुनी
जैसे कोई कहता हो
ले फिर तुमको मात मिली.
मातें कैसी घातें क्या
चलते रहता आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया
बचनी भी साथ मिली

३.
दर्द का रिश्ता

मसर्रत पे रिवाजों
का सख्त पहरा है,
न जाने कौंन सी
उम्मीद पे दिल ठहरा है
तेरी आंखों में
झलकते हुए
इस गम की कसम
ए दोस्त
दर्द का रिश्ता
बहुत गहरा है
---------------------- रवि के. गुरुबक्षाणी
स्ट्रीट न. 5, रविग्राम, तेलीबांधा, रायपुर छ.ग. 492006
मोबाइल--8109224468
ईमेल--

Monday, March 15, 2010

चल उड़ जा रे पंछी, कि अब ये देश हुआ बेगाना...






गीत गाथा--------रवि के. गुरुबक्षाणी
चल उड़ जा रे पंछी, कि अब ये देश हुआ बेगाना...संगीत की दुनिया अदभुत है साथियों . कहा जाता है संगीत मुरदा दिलों में जान डाल देता है. इसका सीधा मतलब यह है कि जिसे गीत-संगीत पसंद नहीं वह मुरदों से गया बीता है. जीवन कितना लंबा होता है और मौत कितनी छोटी होती है. बस एक हिचकी और उतार-चढ़ाव की भीड़ से भरी जिदंगी एक पल में खत्म. इस गीत में भी ऐसा ही होता है. जब बलराज साहनी दुनिया से उठ जाते हैं तो यह गीत परदे पे आता है.
अब न तो गीतकार राजेंद्र कृष्ण है, न संगीतकार चित्रगुप्त, न रफी और न पारिवारिक फिल्मों के स्थायी करुण नायक बलराज साहनी. मगर जब भी यह गीत अनचट्टे, कान में पड़ जाता है. इन चारों महानों के याद की लौ जेहन में तेज हो जाती है. याद आता है कैसे इस गीत ने देश को बांध दिया था. उन दिनों देहातों में, शादी ब्याह के मौके पर साउंड सर्विस वाले पहुंचने लगे थे और गानों के तवे बजाया करते थे. उन्हीं के जरिये यह गीत भी दूर-दराज गांवों तक पहुंच गया था. देहात के बूढ़े किसान और उनकी गृहिणियां इस गीत में अपनी सदियों पुरानी भारतीय संस्कृति और सुदीर्घ भारतीय वैराग्य की छाया देखा करते थे. यह गीत आम आदमी के दैन्य को (जो गरीबी से उपजता है ) भली-भांति पकड़ता था. गीत में आने वाले पंछी, आबोदाना, जोगी वाला फेरा और पंख-पखेरु जैसे अलफाजों ने गांवों और सिनेमा को करीब ला दिया था.
1957 साल की बात है यह. देखा जाए तो इस मर्मस्पर्र्शी ग्राम्यगीत की विकट लोकप्रियता का कारण स्वयं राजेंद्र कृष्ण के बोल है. इतनी सरल सुदंर कविता, बोलचाल की सी रवानी, सादगी और जज्बात में डूबे लफ्ज, जिदंगी की तल्खों को बयान करता पंछी वाला रुपक, अंत तक इनका निर्वाह और कसा हुआ छंद छोटे मोटे इल्हाम से कम नहीं थे. राजेंद्र कृष्ण ने प्रदीप की याद दिला दी थीं.
दो भागों में इस लंबे गीत को उन्होंने एक अटूट सांस की तरह फूलों की हथेली पर उतार दिया था. काव्य की देवी उन पर रीझ जो गई थीं. दूसरा कमाल चित्रगुप्त ने किया था. उन्होंने ऐसी आसान हिदुंस्तानी धुन बनाई, ऐसा भावानुकूल वाध्य बजाया था, तबले से ऐसा सुसंगत काम लिया था, कि गीत दिलों में उतरता चला गया. आज भी ग्रामीण हिदुंस्तान की आत्मा को दर्शाने वाले चंद कालजयी गीतों में शायद इसी गीत का शुमार होगा. जरा इन गीतों को याद कीजिए- पिजंरे के पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोय, जुन्हरिया कटती जाए रे, जियरा जरत रहत दिन रैन, अजब तोरी दुनिया हो रामा, धरती कहे पुकार के मौसम बीता जाए, तक तक तक तक तगिन तगिन गिन गिन रे और एक कली और दो पतियां, जाने हमरी सब बतियां वगैरह. फिल्म भाभी के चल उड़ जा रे पंछी में सदियों के ग्रामीण हिदुंस्तान का चिर-परिचित बूढ़ा किसान , नया होरी जिदंा हो गया था. यूं फिल्म की कथा गांव-गुठान से कोई वास्ता नहीं रखती थीं. पर यह गीत शहरों से ज्यादा गांवों में पसंद किया गया था. तब इस गीत को गांवों में जब कोई बीमार पड़ जाता था तो उसे यह गीत सुनाया जाता था. मां-बाप की, खेत-खलिहान की, बलवाड़ा के भरे-पूरे ताल की और शादी के साल की यादें ताजा होती है. उस बीमार को बड़ा सुकून मिलता था.
बहुत कम लोगों को मालूम है कि इस गीत को ऐन इसी धुन में पहले तलत की आवाज में रिकॉर्ड किया गया था. मगर बाद में ऐसा महसूसा गया कि गीत में जो सार्वभौमिक टच है, व्यथा-वेदना की उठान है और आकाशी विस्तार है, उसे देखते रफी का गायन ही गीत को पूरा कवर कर सकता है. आंकलन सही था. परदे पर रफी की आवाज ही आई और रफी ने इस गीत के ग्रामीण हिदुंस्तानी दर्द को देशव्यापी आयाम दे दिया. पढि़ए इस गीत को और खो जाइए यादों के पुराने गलियारों में-
चल उड़ जा रे पंछी..
चल उड़ जा रे पंछी, के अब ये देश हुआ बेगाना-
चल उड़ जा रे पंछी..
खत्म हुए दिन उस डाली के, जिस पर तेरा बसेरा था,
आज यहां और कल हो वहां, ये जोगी वाला फेरा था,
ये तेरी जागीर नहीं थी, चार घड़ी का डेरा था,
सदा रहा है इस दुनिया में किसका आबोदाना.
चल उड़ जा रे पंछी..बेगाना..पंछी..
तूने तूने तिनका तिनका चुनकर, नगरी एक बसाई
बारिश में तेरी भीगी पांखें, धूप में गर्मी खाई
गम न कर जो तेरी मेहनत, तेरे काम न आई
अच्छा है कुछ ले जाने से, देकर ही कुछ जाना
चल उड़ जा रे पंछी..बेगाना..पंछी..
भूल जा अब वो मस्त हवा, वो उडऩा डॉली डॉली,
जग की आंख का कांटा बन गई, चाल तेरी मतवाली
कौंन भला उस बाग को पूछे हो न जिसका माली,
तेरी किस्मत में लिखा है जीते जी मर जाना
चल उड़ जा रे पंछी..बेगाना..पंछी..
रोते हैं सब पंख पखेरु साथ तेरे जो खेले
जिनके साथ लगाए तूने अरमानों के मेले
भीगी आँखों से ही उनकी आज दुआंए ले ले
किसको पता है इस नगरी में कब हो तेरा आना
चल उड़ जा रे पंछी..बेगाना..चल पंछी..

साफ है कि गीत किसी खास क्लाइमेक्स या अंत के लिए लिखा गया था. पर काव्य सृजन के साथ यह उत्तम संयोग रहा कि पंछी शब्द की लीड से एक बढिय़ा सिचुएशन गीत तैयार हो गया और संदर्भ के बाहर की व्यापक कविता भी बन गया. आज राजेंद्र कृष्ण बस इस गीत के लिए इतिहास है और रफी साहब? उनकी मत पूछिए. उनके बिना कोई भी चरम-गीत या पृष्ठभूमि गीत निष्प्राण है. सब जानते है कि संदेश की सार्वभौमिकता को अभिव्यक्त करने के लिए एक ब्रम्हाांडीय आवाज चाहिए. वह रफी साहब के पास थीं. एक न्याय इस तरह हुआ. साथ ही रफी ने इस गीत को ऐसी तल्लीनता, आत्मीयता और सूफी फकीरों के बैरागीपन से गाया कि आधे आँसू और आधी भूख से भरा कातर हिदुंस्तान इस गीत में बोल उठा. गीत हमें अवाक कर जाता है. यह रससिद्ध रफी की ताकत थीं. सोचता हूं यह करिश्मा कैसे होगा कि वक्त की घड़ी उल्टी घूम जाए मौत के हाथों छीने हुए माता-पिता फिर से मिल जाएं और उनकी जगमगाती आँखों में मैं खुद को एक बार बहचान सकूंँ.. क्या यह बताना पड़ेगा, दोस्तों कि आँखों की मौत से ही स्थायी विरह के थाप को भोगना शुरु होता है? किसी को खोना सर्वप्रथम आँखों को खोना है. कैसे कहूँ कि दिवंगत पिता याद आते हैं इस गीत में -और उनकी आँखें याद नहीं आतीं.
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स्टृीट 5, गल्र्स स्कूल के सामने, रविग्राम, तेलीबाँधा, रायपुर छत्तीसगढ़ 492006
मोबाइल-8109224468.